Monday, March 26, 2012

Ab Phool Ki.......

- अब फूल की पंखड़ी खिली ,यौवन की हवा चली ,काले बादल मचले ,अब वर्षा चली -चली | मदमस्त मोर कूके ,लो सावन की झड़ी लगी ,आमों पर बौर खिली यौवन की अंगडाई चली -चली | सावन की घटा उड़ी,बादल के पर लगे ,स्वप्निल स्वप्न बिखरे धरा ने ली अंगड़ाई, धूप की तपन लगी लगी | पतझड़ का मौसम आया ,पेड़ों के पत्ते उड़े मानव मन उलझा,श्रम जल बहा-बहा |बसंत आया उल्लसित मन चंचल हो आया, बागों में कली चटकी,फूलों पर भंवरा आया , सुमधुर मधु बहा- बहा |दिन हवा हुए धूप रंगीली दुपहरी सिसकी शाम चली-चली |रात उठी हवाएं बहकी तरंगें खिची ,तृप्ति हो चली -चली |गुलाबी नयनों में स्वप्न तिरे मुस्कराहट सजी प्रेम पगे तीर चले मनभावन गीतों का गुंजन हुआ -हुआ | काम तृषित गहने महके ,बंद आखें मुस्कराई सरस मन हर्षित हुए ,यौवन की मदमस्त जवानी खुली-खुली | छवि के वसंत गुलाब खिले, बिन पिया के पपीहा बोला कोयल ने क्यों शांत वन में गाया बिरही आँसू बहे- बहे |

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