लगता है तथाकथित सम्मान छोड़ू लेखक श्री अरुण शोरी को भूल गए जब उनके चेहरे पर कालिख पोती गई तब कानों पर जूं तक नहीं रेंगी थी ! अपने को प्रगतिशील कहने वाले ये लेखक केवल मुस्लिमों प्रवक्ता हैं उनकी कोई भी बात मुस्लिमों से शुरू होती है और वहीं से समाप्त होती है l इन्हे ईसाई सिखों आदि से कोई मतलब नही इनकी निष्ठा भी इस देश में नही मार्क्स मैं है l समय चक्र घूम रहा है तो तिलमिला रहे हैं देश में कोई भी कुत्ता,सांप छछूदर राज करे बीजेपी बर्दाश्त नही पेंसठ साल से दौड़ता प्रगतिशील घोड़ा बूढ़ा हो गया है इसका अहसास नही है उन्हें तभी अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं।
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