Monday, August 19, 2013

नवयौवन  ! ,तुम आ जाना ,सुनहरे सपनों के खातिर ,तुम नवपंखी हरित में उछाल भर ,गेहूं की बाली के जीवन सा /तुम / मत बिखर जाना ,ओ  नवयौवन ! तुम तब आना जब अबोध बच्चे की भोली -भाली सूरत पर निर्मल हसीं हो ,उसे जीवन की काली  चट्टानों, दरारों को देखने की छमता तो हो ,हो अगर समतल तल उस पर खड़े हो मुस्काना ,नवयौवन तुम … बिखरे ज्वारों के मध्य तुम आ जाना ढूढ़ तुम मोती लाना ,जो अगर ज्वार थम जाये ,रह तुम वहीं जाना नवयौवन  तुम …. ऐ  नवयौवन ! लम्बी -काली उबड़ -खाबड़ सड़क से आना ,तो ,आधुनिक जीवन को भूल वहीं आना, अगर हो सके तो अपनापन ले आना ,अरे नवयौवन ! तुम ऊची ,नीची ,छोटी -बड़ी घाटी जंगलों ,पत्थरों के सहारे  पगडंडी से आना ,तो गाँव के द्वारे भोला -भाला मिटटी तले अधनंगा ,नाक बहाता धूप ,में खड़ा किसी की तलाश में आशा लगाये बच्चा मिल जाये ,उसे चूम जरूर आना चाहे तुम मत आना . ओ नवयोवन ,तुम स्कूल -कालेजों के मैदानों से आधुनिक परिसरों से होकर आना, तो तुम चाहे मत आना ,अगर आना तो एक सिर्फ एक भगतसिंह  को उठा जरूर लाना . ओ नवयौवन तुम आ जाना . --------२-४-१९८०   

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